Tuesday, 2 January 2018

मुक्ति मिटने में नहीं, बदलने में है !





देव सुनो,
दूर किसी दरवाज़े, किसी पेड़ से लटकती हुई
चाइम्स बेल की झंकार सुनाई दे रही है ?
ये आवाज़ें ....
इतनी ही दूर रहेंगी।
तुम इनका पीछा करोगे तब भी....
ये एक दूरी बनाए रखेंगी।
और फिर धीरे-धीरे लुप्त हो जाएंगी।

दरअसल ये आवाज़ें, आवाज़ नहीं लम्हे हैं।
गुज़श्ता साल के लम्हे !!
जो अब तुमसे विदा ले रहे हैं।

कभी दुःख की पुड़िया में लिपटा सुख
तो कभी सुख के कलेवर में लिपटा दुःख।

कभी-कभी,
कुछ चीज़ें इतनी अचानक हो जाती हैं
कि हम उनका हिस्सा होकर भी
बस दर्शक बने देखते रह जाते हैं।
और कभी-कभी
कुछ लम्हे इतने धीमे रेंग-रेंग कर निकलते हैं
कि उनके गुज़र जाने के बहुत बाद भी
उनकी छुअन महसूस होती रहती है।

पता है
अभी-अभी मैंने क्या महसूस किया !
सिगड़ी पर रखी, धुंआ उगलती एक केतली।
बंगाली साड़ी पहने एक युवती
और समीप खड़ा उसका प्रेमी।
कुर्ता पहने
सफेद हो रही अपने बालों की कलम पर हाथ फेरता
स्निग्ध त्वचा वाला 
......वो प्रेमी।

ज़रूरी तो नहीं
कि हर बार जब कोई स्वप्न बुनो
तो उसका एक निर्धारित स्वरूप हो।
अक्सर हमें समय की गति तो पता लगती है देव
मगर हम
ख़ुद को स्थिर मानने की भूल कर बैठते हैं।
हम...
जो जाने कितने प्रकाश वर्ष हर दिन चला करते हैं
भीतर ही भीतर !

एक बात बताओ,
जब-जब मैं तुमसे ये कहती हूँ
कि हम सब अपनी अपनी यात्रा पर हैं।
तब-तब तुम
इतने व्यथित क्यों हो जाते हो ?
बोलो....
मैं जानती हूँ
अकेली यात्राओं की कल्पना मात्र ही से
तुम सिहर उठते हो।
लेकिन ये तो सोचो
उस यात्रा की सिद्धि भी तुम्हारी होगी
और अनुभव भी सिर्फ तुम्हारा !
कुछ यात्राएं 
नितांत व्यक्तिगत होती हैं देव
जिसमें पहले क्रम पर भी हम ही हुआ करते हैं
और सबसे आख़िर में भी बस हम ही खड़े होते हैं।
लेकिन स्वीकारने से डरते हैं
पर डर कर भी क्या होगा
जो करना है
सो तो करना ही पड़ेगा ना !

कोई आर्त्र स्वर में पुकारता है
"मेरे पास ही रहना।"
जवाब में एक मद्धम स्वर उभरता है
"मैं हमेशा से तुम्हारे साथ हूँ।
यहाँ...
तुम्हारे भीतर !"

छटपटाहट की सीमा लाँघ कर
आँखों में सूनी तड़प लिये।
एक बार सिर उठाकर
आसमान की ओर देखना देव
तब जान पाओगे
कि मोक्ष जीते जी मिला करता है।
मुक्ति के लिए मिटना नहीं होता
हाँ,
रूप बदल जाया करते हैं अक्सर।

देखो तो,
सूर्य की ये किरणें
धुँए के अस्तित्व को उजागर कर रही हैं।
लोबान ने जल कर सुगन्ध बिखेरी
और फिर उसका धुंआ बादल बन गया।
बादल.... जो एक दिन
हम सब पर बरसेगा।
मुक्ति मिटने में नहीं देव
रूप बदलने में है।
समझे हो !

तुम्हारी
मैं !



‘वो’ याद आती है मुझको और आती रहेगी !




बचपन की यादों का वो कस्बा ...
बस्ती से कुछ दूर
हाइवे के पास वाली चौड़ी पगडंडी
जिसके बायीं ओर
पेड़ों और झड़ियों का झुरमुट
झुरमुट के उस पार एक बंगला
जिसे कस्बे वाले 'कोठी' कहा करते थे
कोठी.... जहाँ पर ‘वो’ रहती थी।

अरुणिमा....
हाँ,
यही था उसका नाम !
जो मुझे बहुत बाद में पता चला।

कम ही दिखाई देती थी 'वो' !
उसके दिखने का समय भी लगभग निश्चित हुआ करता था।
सुबह, सूरज चढ़ने के पहले
और संध्या गोधूलि के समय।
विक्टोरियन स्टाइल का
ऊँची दीवारों वाला बड़ा सा बंगला
विशाल लॉन,
तरह-तरह के फल और फूल वाले पेड़-पौधे !

कितने सपनीले थे,
वे स्कूली दिन ... !
एक सहपाठी ने बताया था मुझे
अरुणिमा के बारे में।
और ये हिदायत भी दे डाली थी
कि उसके सामने मत चले जाना
नहीं तो...
उसके देखने भर से
तुम भाप बनकर कहीं गुम हो जाओगे !

बातें बे-सिर-पैर की थीं
लेकिन जिस तरह से कही गयी थीं 
उनपर भरोसा करना लाज़मी था।


एक दिन उत्साहित होकर
मैं कोठी तक चला गया
मगर,
मूँछों वाले चौकीदार की गुर्राहट सुनकर
उल्टे पैर भाग आया।
फिर कई दिनों तक मैंने
बगीची वाली उस कोठी का रुख नहीं किया।

बड़े दिनों की छुट्टियाँ चल रही थीं
थोड़ा उत्साहित और थोड़ा सहमा सा मैं
पेड़ों का झुरमुट पार कर
कोठी के मुख्य द्वार तक चला आया
और तभी...
मेरे मन की मुराद पूरी हो गयी।
जिस सुंदरी के अब तक सिर्फ किस्से सुने थे
वो मेरे सामने साक्षात खड़ी थी !

उस दिन पहली बार मैंने जाना
कि दिल.....
एक खास तरीके से कैसे धड़कता है।


वो मुझे देखकर मुस्काई
फिर इशारे से अपने पास बुलाया
मेरा हाथ पकड़ कर बंगले के भीतर ले गई
और ताज़ी प्लम-केक खिलाई।
मैं सकुचाया सा बैठा रहा
वो मुझे देख-देख हँसती रही।
उसके बाद
जाने कब और कैसे
मैं वहाँ से उठकर घर चला आया
मुझे पता नहीं चला।

बहुत खुश था मैं उस दिन
सच कहूँ तो जीवन में पहली बार महसूस की थी
.... वो अजीब सी खुशी !



लोग कहते थे 
कि ‘वो’ दो ही त्योहार मनाती थी।
दीवाली पर दीये जलाती,
और क्रिसमस पर केक बनाती थी !

कुछ महीनों तक
उसके पास जाने का मेरा सिलसिला बदस्तूर रहा।
फिर परीक्षा का दौर शुरू हो गया।
गर्मी की छुट्टियों में
नाना-नानी के घर चला गया।
वहाँ से आकर
अगली कक्षा की
ताज़ी किताबों की खुशबू लेने में मसरूफ़ हो गया।

एकदिन रिम-झिम बूँदा-बाँदी के बीच
कुछ काली लंबी गाडियाँ
अरुणिमा के घर की ओर जाते देखीं
तो मैंने भी अपनी साइकल का रुख उधर कर दिया।
अजीब सा उदास माहौल था
काले कपड़ों में कुछ औरतें
एक अधेड़ औरत को संभाले थीं
जो बिलख-बिलख कर रो रही थी।
मैंने बहुत खोजा
पर अरुणिमा नहीं दिखी !
समझ नहीं पाया कि क्या हुआ।
मगर मेरा दिल विचित्र तरह से डूब गया।
मैं हताश सा चला आया।

अगले दिन स्कूल के लगभग सभी पीरियड खाली थे
न तो प्राचार्य आए थे, ना ही क्लास-टीचर !
सब बच्चे खुसर-पुसर कर रहे थे
ज़्यादा कुछ सुन-समझ नहीं पाया !
बस इतना पता चला
कि अरुणिमा नहीं रही।
कल उसका देहांत हो गया।
मैं स्कूल-बैग को कक्षा में ही छोड़कर
रोते हुये घर भाग आया।

अगले दो-तीन दिन मैं बस रोता रहा
.... सबसे छुपकर !
पूरे तीन महीने बाद
जब मैं उस कोठी की ओर गया
तो वो पूरा बंगला
जैसे खण्डहर हो चुका था।
मुरझाए पेड़-पौधे, झूलता हुआ ताला
और धूल भरी दीवारें !!

सुना किसीसे बहुत बाद में
कि अरुणिमा जब मरी
तो उसको लेने परियाँ आयीं थीं !
उसके कमरे का आईना भी
ठीक उसी पल चटख कर टूट गया था।

आज इतने सालों बाद भी
दिसम्बर के बड़े दिनों में
प्लम-केक लाना नहीं भूलता मैं !
‘वो’ याद आती है मुझको
और तब तक आती रहेगी
जब तक मैं रहूँगा !!!

तुम्हारा
देव




स्वीकार और तिरस्कार से परे है ... हमारा प्यार !






कितना कुछ उमड़ता-घुमड़ता है
मेरे भीतर,
मेरे आस-पास !
तपाता हूँ ख़ुद को
मगर जाने क्यों
उफन कर भी,
पूरा नहीं उफन पाता !!
सैलाब आकर भी नहीं आ पाता
मैं चाहकर भी खाली नहीं हो पाता !
उबल कर उफनता है कुछ,
पर गिर कर बहता नहीं;
अधर में ही झूल जाया करता है अक्सर !

कभी-कभी लगता है
कि तुम्हारा सामना करना
इस दुनिया का सबसे दुरूह काम है।
जैसे सौ फीट ऊँची बंधी रस्सी पर
संतुलन बनाते हुये,
‘नट’ बनकर चलना !
जैसे मौत के कुएँ में
स्पीडोमीटर की ‘आखिरी सीमा’ को छूते हुए,
मोटर-साइकल चलाना !
जैसे तलवार को
मुँह के रास्ते पेट में डालने वाला,
‘खतरनाक खेल’ दिखाना !

फिर ये लगता है
कि तुम्हारा सामना करूँ ही क्यों ?
मैं तो बस.....
तुमको प्यार करना चाहता हूँ।
तुम्हारे एहसास के हिंडोले में
हिचकोले लेना चाहता हूँ !

कभी वैदिक ऋचाओं सी जटिल
तो कभी नागार्जुन की कविता सी सरल
कितने-कितने रूप हैं तुम्हारे !!

जंगली फूल को बालों में खोंसे
नंगे पैर, सफेद रेती पर
हरी-नीली समंदरी लहरों के
समानांतर चलती .... तुम !
और हतप्रभ सा
अपलक निहारता ... मैं !!
बच्चों सा औत्सुक्य लिये
कभी तुमको एकटक देखता
तो कभी तुम्हारी आहट पर छिप जाता मैं !

घोर असहमत हो जाते हैं, कई बार तुम और मैं !
और फिर
अपनी-अपनी सोच का सिरा थामे
थिर जाते हैं ....
दो ध्रुवों की तरह अटल होकर !
मैं बेकल सा छटपटाता हूँ
और तुम ठोस स्वर में कहती हो
“इट वॉज़ नॉट अ स्टेटमेंट,
इट वॉज़ जस्ट एन एक्स्प्रेशन.”
और तब.....
मैं मायूसी की खोह में दुबक जाता हूँ।

फिर एक दिन.....
मेरी आवाज़ को सुन
रुआंसी होकर तुम ज़िद कर बैठती हो
“तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं,
अभी डॉक्टर के यहाँ चलो !”
हमारी आँखें मिलती हैं
मैं नम हो जाता हूँ,
तुम उस समय कुछ नहीं कहतीं
पर बाद में फोन करके
बहुत धीरे से कहती हो....
“इतनी भावुकता अच्छी नहीं,
रोये तो नहीं थे तुम !
मेरे जाने के बाद ?”
..... और मैं फूट-फूट कर रो पड़ता हूँ।

स्वीकार और तिरस्कार,
दोनों से परे है हमारा प्यार !
सुनो ओ मुनिया ....
तुम्हारा हाथ थामकर
भावों के समंदर की तलहटी में
गहरे पैठ जाना चाहता हूँ अब....
.... हमेशा के लिये !!!


तुम्हारा
देव



जाने कैसी आदतें अपने साथ लेकर आया हूँ




सीलन भरी दीवारें 
दीमक लगी चौखट
टूटी हुई बंदनवार 
और एक झूलता दरवाज़ा;
ये ही सब संकेत हैं 
मेरे मन का हाल बताने को !
“जितना सुलझाता हूँ उतनी उलझती जाती है,
ज़िंदगी मेरे आगे सवाल बन जाती है।”

मैं वो कभी हो ही नहीं पाया 
जो मुझे होना था। 
और मेरे होने के लिए 
जिस एक चीज़ की दरकार थी 
वो सिर्फ़ सुकून था !

सुकून मिलकर भी नहीं मिला कभी !
छोटी-छोटी बातें 
बड़े-बड़े व्यवधान का रूप लेकर 
हर बार... 
मेरी राहों का रोड़ा बनती चली गईं। 

सबकुछ मिल जाता है मुझे 
बस सुकून की ‘वो’ छांह नहीं मिलती !
सर्द रातों में कभी-कभी नींद नहीं आती
और आ भी जाये 
तो ऐसे सपने आते हैं 
कि उठकर बैठ जाता हूँ। 
ये सोचकर सिहरने लगता हूँ 
कि कहीं नींद आ गयी 
तो मेरा दुःस्वप्न 
फिर वहीं से न शुरू हो जाये 
जहाँ अधूरा छूटा था। 
“बदसलूकी के ये सपने और पूरी रात बाक़ी,
पूर्णता के मोड़ पर ही लग रही हर बात बाक़ी।”

जाने कैसी आदतें अपने साथ लेकर आया हूँ,
कि एक मर्ज़ का इलाज़ खोजने में 
दूसरे मर्ज़ का सहारा ले लेता हूँ। 
और ये सब इतना अप्रत्यक्ष होता है 
कि समझकर भी नहीं समझ पाता !

हमारे अलावा भी 
एक शख़्स रहता है ना 
.... हमारे भीतर !
जिससे कि हम 
अपनी वो बातें साझा किया करते हैं 
जिन्हें हम कभी दुनिया के सामने नहीं लाते। 
मेरे भीतर का वो शख़्स ‘तुम’ हो !
चाहे मैं तुमको ख़त लिखूँ या न लिखूँ, 
चाहे मैं तुमसे बात करूँ या न करूँ,
हक़ीक़त तो ये है 
कि हर-पल 
मैं तुमसे ख़ुद को साझा करता रहता हूँ। 

हाँ,
एक बात और....
मुझे पता है 
कि कुछ बातें हमेशा अनकही रह जायेंगी
कुछ खुशियाँ कभी नहीं मिल पाएँगी 
कुछ मुलाकातें अधूरी ही छूट जाएँगी
मगर तब भी ....
उनका ख़याल, उनके पूर्ण होने की चाहत 
हमें ज़िंदा रखेगी 
आख़िरी साँस तक !

एक गुज़ारिश है तुमसे 
मेरी बातों के मतलब 
सिर्फ़ मेरे शब्दों में मत ढूँढना;
मेरी तस्वीर को 
अपनी उँगली से छूकर 
तुम्हारे स्पंदन में मुझको जीना !
शायद तब ....
तुम मुझको समझ सको !!

तुम्हारा 
देव




क्षण-भर को लगा जैसे, वो नहीं ‘तुम’ हो !





देव मेरे,
कहाँ हो ?
कितने दिन हुए
इतना लंबा इंतज़ार .....
लेकिन तब भी,
कोई एक ख़त तक नहीं !!
पता है मुझे ...
मसरूफ़ियत तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ती,
लेकिन तुम इतने चुप 
पहले नहीं हुये कभी। 
कहाँ गयी तुम्हारी वो बेचैनियाँ ?
या फिर अब तुम भी ....

प्रेमी मेरे,
इन बेचैनियों से ही तो 
ये संसार चल रहा है। 
कलियों को खिलने की,
पानी को बहने की,
धरती को घूर्णन की ...
सबकी अपनी-अपनी बेचैनियाँ !

अभी जब एकांत में 
मैंने तुमको सोचा,
तो अनायास ही 
वो रेवड़ीवाला याद आ गया।
पहले-पहल जिसने 
अपनी मीठी रेवड़ी का स्वाद जगाया 
और फिर अचानक,
गायब हो गया। 
बाद में जब लौटा 
तो उसने अपनी रेवड़ियों के दाम बढ़ा लिये।
तुम न ऐसे बन जाना,
चस्का लगाकर, बदल जाने वाले। 
प्रेमी हो तुम ...
प्रेमी ही रहना, व्यापारी न बनना !

अरे हाँ,
कुछ दिनों पहले 
मैं घूमने गई थी, 
यहाँ से बहुत दूर .....!
घूमते-घूमते एक मंदिर में चली गयी। 
प्रसाद लिया, पर चढ़ाया नहीं 
वहीं मंदिर के प्रांगण में 
पंछियों के लिये बिखेर दिया। 
तभी जाने कहाँ से दो गिलहरियाँ चली आईं।
उनमें से एक,
मेरे क़रीब आकर आँखों ही आँखों में बतियाने लगी।
इधर उधर फुदकती
थोड़ा सा मटकती,
मैंने एक दाना आगे बढ़ाया
पर उसने नहीं खाया,
मेरी हथेली को चूमा 
और फिर चली गयी। 
बड़ा अनोखा था उसका स्पर्श !
क्षण-भर को लगा जैसे,
वो नहीं ‘तुम’ हो !
आज ही लौटी हूँ 
और ख़त लिखने बैठ गयी। 

देव सुनो,
इश्क़ के इज़हार का 
कोई निश्चित दिन नहीं होता। 
जब, जैसे दिल करे 
तब, वैसे लिखना। 
...... मगर ख़त ज़रूर लिखना !
बाँध और बंधन से 
परे हो चुके तुम ;
समझे हो !
इंतज़ार में.... 

तुम्हारी 
मैं !



ताकि लोग, परखने की बजाय प्रेम कर सकें !!!




काल अपनी कसौटी पर 
हर चीज़ कस लेता है। 
मगर कभी,
प्रेम की गहराई नहीं परख पाता !
काल से परे है प्रेम !!
इसीलिए आज भी राधा, लैला, शीरी, साहिबा और मीरा
सब की सब समकालीन लगती हैं !

हाथों में तुम्हारे गहने लिए,
एक सुनार के पास गिरवी रखने जाता हूँ....
अपने प्यार की निशानी, वो गहने
जिनको सुनार बड़ी बेदर्दी से
एक चिकने काले पत्थर पर घिसने लगता है।
पत्थर के जिस्म पर
जगह-जगह सुनहरी चमकीली रेखाएँ उभर आती हैं।
ठीक तभी...
मेरे मन में दो विपरीत धाराएँ आपस में उलझ पड़ती हैं।
एक धारा कहती है .....
कि सोना एकदम ख़रा निकले, ताकि ज़्यादा क़ीमत मिल सके।
और दूसरी धारा ....
मुझे अपराध-बोध के गर्त में लिए जाती है।

पत्थर को हाथ में लेकर निहारता हूँ
तो उसमें तुम दिखाई देती हो
उन्हीं गहनों का श्रृंगार किए !
ख़ुद को दिलासा देता हूँ।
अपना ध्यान कहीं और लगाने के लिए
त्योहारों के बारे में सोचने लगता हूँ।
शरद पूर्णिमा, चाँद, करवा चौथ !!
ओह, ओह, ओह ......
जाने कब से चला आ रहा है ये सिलसिला
चाँद के निकलने तक....
भूखे रहने का !
दुआओं का, लंबी उम्र का !!

एक लड़की चुप-चुप सी ....
अधूरी आस लिये,
हर साल सिंगार करती है
कुछ खाती-पीती भी नहीं !
मगर जिसके लिये ये सब करती है,
वो कभी क़द्र नहीं करता !
दूसरी लड़की....
जो सबके सामने ठहाके लगाकर हँसा करती है
सजती भी है,
लेकिन भूखे रहकर लंबी उम्र वाली बातों को नहीं मानती।

कई-कई बार ...
हम कहीं होकर भी वहाँ नहीं रहते।
और अक्सर....
वहाँ पर पाये जाते हैं,
जहाँ मौज़ूद नहीं हुआ करते।

मेरा यक़ीन करो
कॉर्क की डाट लगी, काँच की बोतल के भीतर
छटपटाते पतंगे की तरह हो गया हूँ।
अपने भीतर इतना कुछ बटोर लिया,
कि अब लड़खड़ाने लगा हूँ मैं !

कोई जतन करो,
कि ‘टक्क’ की आवाज़ हो
और ये कॉर्क की डाट खुल जाये।
ताकि मैं,
भरपूर साँस ले सकूँ।

अरे हाँ,
वो सुनार कह रहा था,
कि कसौटी का ये पत्थर
जब पूजा-घर में रख दिया जाता है.....
तो इसको सब ‘शालग्राम’ मानकर पूजते हैं।
क्या ऐसा नहीं हो सकता,
कि हर कसौटी को कुमकुम-अक्षत लगा कर
आस्था से जोड़ दिया जाये...
ताकि लोग, परखने की बजाय प्रेम कर सकें !!!
बोलो ?

तुम्हारा
देव




ताकि वो एकदिन, इस सब पर हँस सके !





एक कागज़ उड़ रहा था
इधर से उधर !
एक साधारण सा कागज़..
जानती थी मैं,
कि ये तुम्हारा ख़त नहीं
फिर भी अचानक
कुछ ऐसा दिख गया
कि मैंने वो कागज़ सहेज लिया।
तीन आड़ी लकीरों से काटे गये
छोटे-छोटे चार पैरा,
बड़े से अक्षरों में लिखा हुआ P.T.O.
और साथ में एक उदास इमोज़ी !

कागज़ पढ़ कर मैं कुछ समझ नहीं पाई 
लेकिन उलझी हुई पंक्तियों में
कुछ शब्द झांकते दिखे
और ज़ेहन में अटक गए !
"लेखक, चार बजे की बस, इंसान, वयोवृद्ध, टूटे हुए पुर्ज़े, हम ही ज़िम्मेदार....!"

जी में आया कि अभी के अभी
ये शब्द तुमको लिख भेजूँ
और कहूँ कि एक कविता लिखो इन शब्दों पर !
फिर लगा,
कि तुम कहीं वही पुरानी बातें ना सोचने लगे जाओ।
जब चार लोगों की मंडली ने बैठकर
तुम्हारी चुगलियाँ मुझसे की थीं।
"अरे वो देव...
वो तो बात ही इसलिए करता है
कि कोई ख़त, कोई कविता लिख सके !
पत्थर, धूल, पागल या फूल
सबमें ही बस
वो प्यार खोजा करता है।"

तुम सोचते होंगे
कि मैं ये सब क्यों कह रही,
क्योंकि तुम भी अब तक
बस बच्चे ही हो ....
बिल्कुल इस बच्चे जैसे !
कितना मासूम होगा
ये कागज़ लिखने वाला बच्चा
जो गलत लिख देने पर
पहले एक दुख भरा इमोज़ी बनाता है,
फिर सॉरी लिख कर माफ़ी माँगता है
और अंत में वो पन्ना ही फाड़ देता है।

नहीं देव नहीं,
ये अधूरे और गलत पन्ने
हमारे जीवन की किताब के
सबसे सुंदर हिस्से हैं।
इनको अलग करके
हम तिल-तिल ख़ुद को मारते हैं।
मासूम आँखें,
पश्चाताप के मोटे आँसुओं के लिए तो नहीं होतीं;
उनमें सपने भी होते हैं ना !

ये अधूरापन,
उन सपनों की पूर्णता है।
क्यों नहीं देख पाते
अधूरेपन में छिपे शाश्वत सौन्दर्य को !

इस कागज़ को मैं
फ़्रेम करवा कर रखूँगी,
और जब वो बच्चा बड़ा हो जाएगा
तो उसे ये गिफ़्ट कर दूँगी।
ताकि वो एकदिन,
इस सब पर हँस सके।

हाँ याद आया,
छोटी नानी जब भी हलवा बनाती
तो बार-बार उसका स्वाद पूछा करती,
हम बच्चे खाने में मगन रहते
वो बीच-बीच में टोका करतीं
"कैसा लगा ?
मीठा कम तो नहीं ?"
और हम सिर्फ स्वाद का आनंद लेते
बगैर कुछ बोले।

देव सुनो...
कविताएं लिखो
अपनी ठहरी हुई आवाज़ में सुनाओ,
फिर पल भर की देरी किये बग़ैर
वहाँ से चले आओ।
मत देखो, मत पूछो
कि लोगों को कैसी लगी।
सर्जक हो तुम 
और ख़ुद पर ही भरोसा नहीं !

पगलू मेरे...
इस बार रावण दहन देखने
तुम्हारे साथ मैं भी चलूँगी;
ठीक चार बजे आ जाना
इंतज़ार करूँगी।

तुम्हारी
मैं !