Thursday, 17 December 2015

हर ओढ़ी हुयी हँसी एक नया शून्य छोड़ जाती है




पिछले दो घंटों से
ख़त लिखने की कोशिश में
कई कागज़ बेकार कर दिये।
लेकिन तब भी
चार पंक्तियाँ हाथ न लग सकीं।

सर्दी ने अब मेरे शहर पर भी कब्ज़ा जमा लिया।
मौसम की पहली सर्द रात
मोज़े चढ़ाये ऊनी टोपी लगाकर बैठा हूँ।
वही बादामी-केसरिया कॉलर वाला स्वेटर
और काले रंग का स्पोर्ट्स-लोअर पहने।

ज़िंदगी ने फिर से रफ़्तार पकड़ ली है।
लोग मिलने आते हैं
चेहरों पे चेहरा धरे सब खिलखिलाते हैं
हर ओढ़ी हुयी हँसी एक नया शून्य छोड़ जाती है।
फिर दिल बहलाने के लिए 
मैं  ‘WhatsApp’ खोल लेता हूँ।
किसी को मैसेज नहीं करता
बस सबके ‘WhatsApp Status’ पढ़ा करता हूँ
कुछ लोग अपने ‘status’ हर दूसरे दिन बदल लेते हैं।

पता नहीं क्यों,
अब मैं चेहरे और शब्द नहीं पढ़ पाता !
लगता है,
जैसे शब्द भी गिरगिट बन गए हैं।
इस जल को ही लो
ये पानी है या आग ....
समझ नहीं पाता। 

सोच रहा हूँ
आज देर तक जागूँगा
शायद ख़ुद से मुलाक़ात हो जाये।
बहुत दिन बीते
ख़ुद से दूर हुये !

साल भी जैसे
आखिरी सांस ले रहा है
जल्द ही दो-तीन हिचकियाँ लेकर दफ़न हो जायेगा।

कुछ अजीब सा हो रहा है मेरे साथ इन दिनों,
पत्थर और पागल दोनों आकर्षित कर रहे हैं।
समझदार लोग पत्थरों जैसे लगते हैं
और पागल लोग स्पंदित इंसानों जैसे।
कभी-कभी दुविधा में पड़ जाता हूँ
कि मैं कौन हूँ ?
पत्थर या स्पंदित इंसान !
फिर सोचता हूँ
कि इंसान बनने की कोशिश में
पागल करार न दे दिया जाऊँ।
इसलिए पत्थर मानकर ही
ख़ुद को समझा लेता हूँ।

शादी-ब्याह में जाना बहुत हो रहा है इन दिनों
लिफ़ाफ़ा थमा कर निकलना चाहो, तो भी बच नहीं सकते।
लोग खाने पर ज़ोर देते हैं।
नहीं खाया जाता मुझसे,
स्टॉल-स्टॉल  घूमकर वही एक जैसा खाना।
तुम्हारे हाथों की गरम ख़ुश्क रोटियाँ याद आती हैं।

सबकुछ कितना बदल गया !
नहीं
, नहीं, शायद मैं ही बदल गया।
मगर देखो
शाहरुख और काजोल तो वैसे ही हैं
इतने सालों से
DDLJ से लेकर दिलवाले तक।

सुनो....
मैं स्पंदित होना चाहता हूँ
लोग कुछ भी कहें
मगर ये पथरीली अनुभूति
हर दिन मुझे जकड़ती जा रही है।
कभी-कभी लगता है
कि तुम तो मुझे पागल न समझ बैठोगी ना ?
प्लीज़,
तुम मुझे वही समझना
... जो मैं हूँ।
एक प्रेमी,
जिसने तुमसे प्रेम किया।

चाहता हूँ
कि मिट्टी का कुल्हड़ बन जाऊँ
और तुम्हें प्रेम-रस बनाकर ख़ुद में उड़ेल लूँ।
फिर इधर-उधर भटकूँ
कभी छलक  जाऊँ
तो कभी मुझ जैसे दीवानों की प्यास बुझाऊँ
और जब...
मैं पूरा खाली हो जाऊँ
तो फिसल कर गिर पड़ूँ
टुकड़े-टुकड़े हो जाने के लिए।
हाँ,
मैं स्पंदित होना चाहता हूँ।

तुम्हारा

देव 



4 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 22 दिसम्बर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. स्पंदित ही रहना चाहिये पत्थर तो बस पत्थर होते हैं।

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  3. स्पंदित ही रहना चाहिये पत्थर तो बस पत्थर होते हैं।

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