Tuesday, 2 January 2018

कितना रूमानी ख़याल है.... !




देव मेरे,
तुम्हें क्या लगता है
कि यदि तुम
मुझसे कुछ छुपाओगे
तो मैं जान नहीं पाऊँगी ?
पहले उमस की छटपटाहट
और अब सीलन की चिपचिपाहट !
लगता है,
जैसे हरदम
दो पाटों के बीच
सिमट जाने की जुगत में लगे रहते हो।

हाँ मानती हूँ
कि जो कुछ तुम्हारे साथ गुज़रा
खौफ़नाक था वो सब !
मगर क्या वो ठहरा रहा ?
दिन बीतते न बीतते गुज़रा नहीं ?

देखो,
यूँ न कसमसाया करो।
और चाहे तुम मानो या न मानो
लेकिन हर घटना
एक संदेश लेकर आती है।
संदेशों को समझना शुरू करो।
उसके बाद
ग्लानि से भर उठना भी बंद कर दोगे।

याद है,
बहुत पहले
एक कागज़ दिया था तुमने
अपने हाथों से एक संदेश लिख कर मुझे !
"कबीर तू हारा भला,
जीतन दे संसार।"

कितना रूमानी ख़याल है....
तब,
जबकि हर कोई जीत रहा हो।
उस वक़्त,
सिर्फ़ तुम हार जाओ।
अहा....
हारने के बाद की वो शांति !
महसूस की है न तुमने ?
अब बनने मत लगना
जानती हूँ मैं
उस शांति की साँय साँय को
तुमने जीया है ख़ुद !

सुनो ओ बावरे....
जो तुमने
ख़ुद अपने हाथों से लिखा था
उसको तुम ही भूल गये ?
कैसे ...?
बताओ भला !

अभी कोई तीन दिन पहले
घनेरे काले मेघों की गर्जना के बीच
छत पर खड़ी होकर
वही कविता दोहरा रही थी।
जो तुमने कभी मुझको
झमाझम बारिश के बीच
भीगते हुए सुनाई थी।

"बिजली चमकी
पानी गिरने का डर है।
वे क्यों भागे जाते हैं
जिनके घर हैं।
वे क्यों चुप हैं
जिनको आती है भाषा।
वह क्या है
जो दिखता है धुआँ धुआँ सा !"

किसकी है ये कविता...?
कवि का नाम भूल गई मैं !
शायद केदारनाथ सिंह ?
याद से नाम लिख भेजना
तुम न भूल जाना।

अरे हाँ,
ये कहने के लिये ख़त लिखने बैठी थी
कि व्यर्थ की बातें न सोचा करो।
जब भी मन
व्यथित होकर सिकुड़ने लगे
तो बेहिचक
मेरे पास चले आया करो।
जानते हो ना...
मेरे प्रेमी हो तुम !!!

तुम्हारी
मैं 




कितनी बार बोला... तुमसे ही हूँ मैं !




आज एक ख़याल कौंधा
कि एडम और ईव में से
किसका दिल आया होगा,
बाग के उस फल पर !
किसका दिल ललचाया होगा..... पहली बार !!
और फिर
उस कठोर सज़ा के मिलने के बाद
किसने किसको दोषी ठहराया होगा।
किसने पहला इल्ज़ाम लगाया होगा।
दोनों में से कौन दुखी होकर भी मुस्कुराया होगा।
आज फिर एक ख़याल कौंधा।

तुमको लगने लगा है ना
कि मैं....
बड़ा आत्मविश्वासी हो चला हूँ इन दिनों
और अब...
मेरे विश्वास से अहंकार छलकने लगा है।

हाँ,
ये सच है
कि नियम, क़ायदे, थोपे हुए रिवाज़
सदा से डराते रहे मुझे।
इसीलिए तो मैंने कभी ग़ज़ल लिखने की कोशिश नहीं की।
ये बहर, काफ़िया, रदीफ़ और ये मीटर....
मुझे भावों के रस्ते की उलझन लगते रहे।
इसीलिए शायद,
मेरे लिये प्यार कभी ग़ज़ल जैसा नहीं रहा।
मगर एक बात तो बताओ
तुमको मुझमें कभी
तुम्हारा अक्स क्यों नज़र नहीं आया ?

जब ओढ़ी,
तब तेरे ही तो प्यार की चादर ओढ़ी री मुनिया।
मेरा सच तो बस इतना है
कि जब-जब तुम्हें याद किया
जब भी तुमसे बात की
जब-जब तुमको देखा;
तब-तब मैं शून्य हो गया।
और शून्य होते ही
मुझे ख़ुद में ब्रह्माण्ड नज़र आने लगा।
अब तुम ही कहो
ब्रह्माण्ड भी कभी दर-ब-दर भटका करता है क्या !

आज तुम्हारी ये चुप्पी
ये नाराज़गी बड़ी बेमतलब सी लग रही है।
कितनी बार बोला
कि तुमसे ही हूँ मैं,
ख़ुद से नहीं हूँ।

जाने क्यों आज
उस कछुए की बहुत याद आ रही है।
स्कूल से लौटते हुए अक्सर हम बच्चे
कबीट के पेड़ वाली बावड़ी पर चले जाते थे।
...हर दोपहर एक से तीन के बीच।
वहाँ सबसे नीचे वाले एरन के पत्थर पर
एक बड़ा सा कछुआ धूप सेंकता बैठा रहता था।
कोई आवाज़ होती
तो ख़ुद में सिकुड़ जाता।
शरारती बच्चे पानी में पत्थर फेंकते
तो हौले से उतरकर
जल की गहराई में विलीन हो जाता।
मैं कई बार अकेला जाकर
उससे बातें किया करता था।
यक़ीन मानो
जब-जब मैं उसे पुकारता
वो अपनी मोटी सी गर्दन ऊपर उठाकर
मुझे देखा करता,
और जब कोई आ जाता
तो वो सिकुड़ जाता।

तुम और मैं भी तो ऐसे ही हैं।
जब भी तुम दुनियावी बंदिशों की गाँठें खोलकर
मुझसे बातें करती हो
तो मैं...
उस कछुए की नाईं,
ख़ुद को फैला देता हूँ।
किन्तु तुम्हारी एक चुप्पी
मुझको सहमा देती है।
ऐसी ठिठौली न किया करो
मैं भी कछुआ बन जाता हूँ...
थिर जाता हूँ धरती पर
पत्थर बनकर !

कुछ ख़ास नहीं है मेरे पास
बस,
एक खोल ज़रूर है
जिसमें सिमट कर मैं
फिर से तुम्हारे चहकने की
राह तकता रहता हूँ।
यक़ीन करो मेरा.....

तुम्हारा
देव



कोई धुन सुनाओ



कई बार बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ
लेकिन उँगलियाँ साथ नहीं देतीं।
अँगूठा भी थकने लगता है।
....यूँ ही मुड़े हुए।
मन करता है
कि कलम उठाऊँ
और कागज़ पर,
आड़ी-तिरछी लकीरें उकेर 
अच्छे से तह लगाकर तुमको भेज दूँ।
फिर जब तुम उस काग़ज़ को खोलो
तो वो जीता-जागता ख़त बन जाये।

अचानक एक कहानी कौंधने लगती है।
एक बच्चा....
लगभग पाँच साल का।
उस बच्चे का पढ़ा-लिखा मज़दूर पिता।
मटमैली जींस,
झीना पड़ चुका अधूरी बाँह का शर्ट
पटरियों पर दौड़ती एक रेलगाड़ी;
बच्चे को गोद में उठाये
रेलगाड़ी के साथ दौड़ता..... वो पिता !
विस्तारित हरा मैदान
घास चरती गायें।

"इन हाथों से ताक़तवर,
संसार में कुछ भी नहीं।"
पिता की ठोस बाहों में अटखेलियाँ करता बच्चा सोचता है।
फिर बढ़ी हुई दाढ़ी पर 
अपने नर्म हाथ रगड़ते हुए अचानक रुक जाता है।
कुछ लोग उनके इर्द-गिर्द जमा होने लगे हैं।
सब मिलकर आग्रह करते हैं
"कोई धुन सुनाओ
बड़े दिन हुए।"
पिता बच्चे को गोद से उतार 
बाजा हाथ में ले लेता है।
मुफ़लिसी के मर्म से
एक तान निकलती है
और वो बच्चा
विस्मयाभिभूत सा
ख़ुद से फिर प्रश्न करने लगता है।
"क्या सच में मेरे पिता इतने विराट हैं ?
क्या सच में इतना सौभाग्यशाली हूँ मैं ?"

और फिर बरसों बाद....
कैंसर से जूझता वही पिता !
अपने जीवन की आख़िरी शाम
अस्पताल के एक कमरे में
चंद लोगों से घिरा,
बहुत हौले स्वर में
एक धुन बजा रहा होता है।
और उसका बेटा
थोड़ी दूरी पर बैठा हुआ
ख़ुद से वही प्रश्न कर रहा है
बचपन के प्रश्न....
जो अब और अधिक स्पष्ट हो चुके हैं।

कहानियाँ शब्दों में खप कर
मन में बाक़ी रह जाती हैं
अक्सर....!!!
और फिर हर कहानी
आकार लिया करती है यथार्थ में
अपने पात्र स्वयं चुनकर !

यक़ीन मानो
मैं नहीं लिखता
कोई लिखवाता है मुझसे।
कितने अधूरे आयाम
पूर्णता की बाट जोहते रहते हैं,
उचित माध्यम की तलाश में।

पिछले हफ़्ते की बात है
छुट्टी की दोपहर
बादलों के इंतज़ार में बैठा हुआ था,
कि तभी मेरे कानों में
एक अजीब सी सम्मोहक धुन गूँजी।
बाहर जाकर देखा
तो गिनी-चुनी बाँसुरियां साथ लिये
एक आदमी दिखा
मानो,
बंसी बेचने का भरम डालकर
कोई धुन सुनाने निकला हो।

पता नहीं क्या हुआ
मैं उसके ठीक सामने जा कर खड़ा हो गया।
मगर वो निर्लिप्त, निर्विकार सा
बाँसुरी में साँस फूँकता रहा।
बजाते-बजाते जब वो वहाँ से चल दिया,
तो मैंने गली के मोड़ तक
उसका पीछा किया।
फिर वो साईकल पर बैठ कर बढ़ चला
और मैं.....
उसके ओझल होने तक वहीं रुका रहा।

कई बार ऐसा होता है ना
कि हमारे भीतर ही कुछ रहता है
जो बाहर नहीं आ पाता
और कोई अनजाना आकर
हमारे ही सामने, हमको ही कुरेद कर
दूर चला जाता है।
और हम बस 
साक्षी बने उसको देखा करते हैं।

बस....
ऐसा ही कुछ हुआ है मेरे साथ !
लब खुल नहीं रहे,
और भावों का उफ़ान अपने चरम पर है !

तुम्हारा
देव



एक डल्ला बाक़ी रह गया कहीं न कहीं


अल्हड़ थी लड़की
उमंगों से भरी हुई
और लड़का संजीदा
ख़ुद ही में खोया सा !
दोनों ने लोगों से ,
बहुत सुन रखा था
इक दूजे के बारे में।
और फिर आख़िर
वे दोनों मिले
एक फ़ैमिली फंक्शन में।
आधे दिन वाली एक सांझ
और पूरे दिन वाली दो रातों के लिए !
एक दूसरे को जब पहली बार देखा
तब आँखें मिली
मगर चार नहीं हो पायीं।
कुछ आड़े आ गया था
दोनों के बीच !
या तो किसी ने आवाज़ लगाई थी
या किसी के हाथ से
कोई गिलास छूटा था
छन्न से !!!
एक मीठा धागा धीरे-धीरे
खट्टी उलझनें फैलाने लगा था
कि तभी...
लड़की ने अनजाने ही एक मज़ाक कर दिया
...लड़के के साथ !!!
लोगों को हँसने का मौका मिल गया
और लड़के की आँखों में
किरकिरी सी आ गई।
वो वहाँ होकर भी
वहाँ का नहीं रहा।
एक दिन गुज़रा
फिर एक रात
अगला दिन ढलने लगा
तो साँझ को लड़की ने संदेसा भिजवाया।
"कोई बात बुरी लगी हो
तो माफ़ कर देना
ना जाने क्या है मेरे साथ भी
ख़ुशी क़रीब आये
तो नज़र लग जाती है।"
लड़के का दिल पिंघला
मगर पूरी तरह नहीं।
एक डल्ला बाक़ी रह गया
कहीं न कहीं।
उसने लड़की को बुलवा भेजा
व्यग्रता पर आस की दुशाला ओढ़े
वो चली आई।
और फिर वे दोनों मिले
दिन और रात के मुहाने पर !
सुरमई अँधेरा गहराने को था।
लड़के ने लड़की का हाथ खींच कर
उसे एक लंबी छाया के तले खड़ा कर दिया।
एक दूसरे की उंगली को थामे
दोनों कुछ देर तक
धक-धक स्पंदन महसूसते रहे।
लड़की हौले से बोली..."सॉरी!"
लड़के ने चाँदी की एक कटोरी में से
ढेर सारे दाने थमाते हुए कहा
"ये लो
इनको मुँह में रखकर
अच्छे से चबा लो
फिर नहीं लगेगी
कभी भी नज़र !"
लड़की ने झट से उसकी बात मान ली
और फिर तुरंत ही
वहाँ से चली गयी।
"बावरी है क्या
देख तो तेरा क्या हाल हुआ है।
काली मिर्च चबाये जा रही है
आँखें देख अपनी
ये लाल-लाल रेशे
ये आँसू
चेहरे पर ये तीखी सी झाल !"
सहेली की बात सुन
रोती हुई लड़की
अचानक हँसने लगी।
अपराध का बोध
तब हज़ार ज़हरीली नोक बन चुभता है
जब प्रायश्चित नहीं हो पाता।
लड़के ने उसी रात
वो जगह छोड़ दी।
जाते जाते मगर कुछ साथ ले आया
हमेशा के वास्ते !
एक दर्द,
एक अपराध-बोध,
या शायद एक अधूरा प्रायश्चित।
हर दूसरे रोज़ वो
दिन और रात के संगम तले
मसालों वाली गली में जाकर
एक ख़ास जगह पर खड़ा हो जाता।
जब लाल पिसी मिर्ची की तीखी धांस आती
तो ख़ूब खाँसता
इतना....
कि खाँसते खाँसते आँसू निकल आते।
फिर पैदल चलने लगता
और हर तीसरे कदम पर
एक कालीमिर्च
मुँह में रख कर दाँतों से दबा देता।
एक गुनाह ...
किसी को साक्षी बना कर किया।
एक प्रायश्चित...
जो सबसे छिप कर बार-बार किया।
सुनो...
मेरा एक काम कर दो ना।
उस लड़की से जाकर इतना कह दो
कि लड़के की हालत कुछ ऐसी है
कि सुक़ून में पीड़ा है
और मुश्किलों में राहत !
बस...
इससे ज़्यादा कुछ भी न कहना।
तुम्हारा
देव



मैं तो पंछी बन गया हूँ प्यारी !




एक अदृश्य तार रहता है
... हम सब में !!
जिसे कोई अनजाना अजनबी आकर
झनझना देता है।
और फिर भीतर ही भीतर
आनंद का सोता बहने लगता है।
किसी जीते जागते स्वार्गिक सुख जैसा !
कितना निर्दोष होता है ना
ये प्यार भी !!!
उस दिन जब तुम्हारे मोबाइल पर
बार-बार नेटवर्क आ और जा रहा था।
तब तुम थोड़ी बेकल हो गयी थीं 
मगर मैं निश्चिंत था।
"इंतज़ार करना आता है मुझको।"
मैंने तो बस
इतना भर कहा था।
मगर उसके बाद तुमने जो कहा,
उसने मुझे अंदर तक भिगो दिया।
"जानती हूँ देव,
कुछ लोग होते हैं ठहरे हुए से....
जो किसी भी हद तक इंतज़ार कर पाते हैं।
बिना किसी आशा या अपेक्षा के
बस...
वैसे ही हो तुम !"
इधर तुमने बात ख़त्म की
और उधर मैं रो पड़ा था
फूट-फूट कर !
तब,
तुमने अपनी दो उँगलियों से छुआ था
.... मेरी कलाई को !
और हौले से बोली थीं
बह जाने दो...
अच्छा लगेगा।
एक बात कहूँ
हर बार जब तुम मुझे पुकारती हो
तब दरअसल ,
तुम्हारी आवाज़ मेरे कानों में नहीं घुलती
वरन,
तुम गुज़र जाती हो, मुझसे होकर...
बहुत भीतर कहीं
आत्मा से सटकर !
अक्सर ये होता है मेरे साथ
कि तुम्हारे जाने के बाद 
तुम्हारे निशान ढूँढता हूँ,
उन पर अपनी उँगलियाँ फेर कर
तुम्हारे स्पंदन को जीता हूँ।
वो मील का पत्थर...
जिस पर तुम,
हर सुबह मॉर्निंग वॉक के समय सुस्ताती हो।
चुपके से जाकर उस पर बैठ जाना
मेरा सबसे प्यारा शग़ल है।
पता है क्या... !
तुम मुझे ट्रांस में लिये जाती हो
और वहाँ से इतनी विराट लगती हो
कि मेरी आँखें चुँधिया जाती हैं।
विस्तारित तुम...
इस क्षितिज से उस फ़लक तक !
अचानक मैं आँखें बंद कर
अपने अदृश्य पंख फैला कर तैरने लगता हूँ...
कभी दायें तो कभी बाँये
मस्ती के हिचकौले लेते हुए !!
उफ़्फ़....
कैसे समझाऊँ तुम्हें
तुम्हारी ही बात मैं !!
सुनो...
उस दिन मेरी कलाई पर
जहाँ तुमने अपनी उंगली रखी थी ना
आज वहाँ मैंने,
अपने होंठ रख दिये।
और जी भर कर पी .... ख़ुशबू तुम्हारी।
यक़ीन करोगी
अभी देखा तो पता चला
कि मेरी कलाई पर उस जगह एक तिल भी है
छोटा सा !!!
कमाल है
तुम्हारे एहसासों में इतना मशगूल रहता हूँ
कि ख़ुद पर भी अब 
ग़ौर नहीं कर पाता।
लेकिन मुझे इसका
रत्तीभर गिला नहीं...
मैं तो पंछी बन गया हूँ प्यारी !
यूँ ही डरा करता था
अब तक उड़ने से...
सच !!!
तुम्हारा
देव



ज़ंजीरों में जकड़े हुए से


भँवरे मेरे,
कहाँ हो ?
कई दिनों से मुलाकात नहीं हुई।
और देखो तो
आज तुम्हारी याद भी आई
तो फूलों का पराग चखती
एक मधुमक्खी को देखकर !
सोचने लगी
कि तुम भी यहीं कहीं
गुन्न-गुन्न करते
इस फूल से उस फूल पर मंडराते दिख जाओगे।
लेकिन नहीं.....
तुम यहाँ नहीं हो।
हो सकता है
किसी दूसरी बगिया में
कोई अनोखा फूल मिल गया हो तुमको....
चटकीला, पराग-रस से भरपूर।
बस,
यही सोचकर
मैंने तुमको नहीं पुकारा !!
कलम उठाई और अपनी बात
पाती पर उतारने बैठ गई।
वैसे एक बात बताओ
भौंरे कभी शहद क्यों नहीं बनाते ?
पराग-रस तो बहुत पीते हैं
फिर भी काले के काले रहते हैं।
और इस छोटी सी मधुमक्खी को देखो
कतरा-कतरा पराग इकट्ठा कर
मधु का निर्माण करती है।
उसका उपभोग भी कोई और कर लेता है,
और ये फिर
नये सिरे से अपने काम में जुट जाती है।
क्या स्त्री और पुरुष में सदा से
इतना ही अंतर होता आया है ?
एक भौंरे और मधुमक्खी के जितना.....
अरे हाँ, याद आया
मधुमक्खियाँ तो अपनी रानी की बात मानती है
तुम सोचते होंगे
कि काश ,
उनका भी कोई राजा होता।
पता नहीं तुम क्या सोचते हो और क्या नहीं;
मगर मैं अक्सर एक बात सोचती हूँ
कि क्या कभी कोई पुरुष, स्त्री को समझ पाया है ?
जानते हो देव,
प्रेम कभी पुराना नहीं होता
और प्रेमी कभी भूतपूर्व नहीं हुआ करते।
गोपियाँ पागल नहीं थीं
पागल तो उद्धव थे
जो गोपियों को ये समझाने गये
कि कान्हा को भूल जाओ !
दरअसल ना,
पुरूष डरपोक होते हैं;
स्वतंत्र विचरण करते हुए भी
जाने कितनी ज़ंजीरों में जकड़े हुए से !
और स्त्रियाँ...
उनके बंधन सिर्फ़ ऊपरी होते हैं
..... तन के बंधन !!!
स्त्रियों का मन
कभी किसी का ग़ुलाम नही होता।
इसीलिए तो हर औरत के भीतर
एक शहज़ादी ज़िंदा रहती है।
और शायद इसीलिये
हर पुरुष अपने अवचेतन में
कहीं न कहीं ख़ुद को ग़ुलाम समझता है।
मैं अक्सर कहा करती हूँ ना....
दो वाक्यों के बीच पढ़ना सीखो,
दो शब्दों के बीच सुनना सीखो।
मेरी आज की बात को
ऐसे ही समझने की कोशिश करना।
और हाँ,
एक बात मानोगे....
कुछ भी दिल पर मत लेना !
तुम्हारी
मैं!



कुछ रिश्ते कभी ख़त्म नहीं होते !!





“मोहिनी डाल दी ना !!
रोका था मैंने .......
कि मत बनने दो,
अपनी निगाहों को जादूगर !
तुम्हारे सम्मोहन में बिंध कर
जो अब फिरता हूँ दर-ब-दर
तो लानत ना देना .....
बे-सबब आवारगी
रास आ गयी है मुझको
देखो तो लोगों ने भी
आवारा का विशेषण जोड़ दिया है
‘आवारा प्रेमी’ पुकारने लगे हैं
मुझे अब सब !!!"
वो बोल रहा था
और लड़की सुन रही थी
बाहर तीखी धूप थी
मगर वे दोनों बेपरवाह थे मौसम से !
और वैसे भी तो
पॉश कॉलोनी की
सबसे आख़िरी गली में
कोने की बिल्डिंग के पाँचवे माले पर थे वे दोनों।
लोगों की निगाह लड़के को इतनी चुभती थी
कि वो,
दूर पेड़ पर बैठे परिंदे को भी
खिड़की के काँच से इस पार
कमरे में झाँकने की इज़ाज़त नहीं देना चाहता था।
और लड़की ...
उसके ऊपरी होठों की किनोर पर
पसीने की बूंदों की छोटी सी लड़ी उभर आई थी
जिसे पोंछने की बजाय
वो अपने रुमाल से चेहरे पर हवा कर रही थी।
कमरे में लगा पुराना एयर-कंडिशनर
रुक-रुक कर अपना बोझ ढोते हुये
गर्मी को अपनी ठंडी हवा से
परे धकेल रहा था !!!
लोग कहते हैं उदासी का रंग नीला होता है
और आज
पर्दे के उस पार से
सूरज की रोशनी
पूरे वातावरण को हल्का नीला बनाने पर तुली हुई थी।
लड़के ने चाहा
कि रूफ़-लाइट्स का स्विच ऑन कर दे,
मगर लड़की ने
उसकी हथेली को हौले से पकड़ कर छोड़ दिया।
वो समझ गया
कि आज का दिन,
कृत्रिम प्रकाश पर भी
एतबार करने का नहीं है
कभी-कभी ऐसा होता है ना
कि बिना बोले ही प्रश्न पूछ लिए जाते हैं
और बिना कुछ कहे ही
उत्तर मिल जाया करते हैं।
ना आँखों की भाषा
ना स्पर्श के संकेत
बस...
एक फुट-पटरी की दूरी पर बैठे दो जिस्म,
अलौकिक स्पंदन को माध्यम बना कर
बात कर लिया करते हैं।
ऐसी मुलाकातें
ज़्यादा देर की नहीं होतीं।
बिना बताये ही
मुलाक़ात का वक़्त भी पूरा हो जाता है।
बिना इज़ाज़त लिए
विदाई भी ले ली जाती है।
उस दिन शाम बड़ी जल्दी घिर आई
और देर तक वहीं रही
...... लड़के के पास !
फिर जाने कहाँ से
कुछ धुएँ के छल्ले उभर आए
जो गहरे और गहरे होते गए।
लड़के ने भी
उनसे मुक्त होना नहीं चाहा,
शायद बंधन में ही आज़ादी थी !
वो बीच-बीच में
खिड़की से झाँक कर देखता रहा
और जब रात ने अपना आँचल पूरा फैला लिया
तो वो बाहर निकल आया।
अभी बस डेढ़ किलोमीटर ही चला था
कि गाड़ी ने चलने से इनकार कर दिया।
ना जाने कब टायर, लौहे के एंगल में धंस कर फट गया था।
ओढ़ी हुई सजगता
कभी-कभी मदहोशी बन जाती है।
वो गाड़ी से नीचे उतरा
और एक अंगड़ाई लेकर
उस दिशा में देखा
जिधर लड़की का घर था।
और लड़की ....
सूजी हुई आँखों से
अपनी रुलाई को भींचे,
लगातार आठवीं बार
वही एक गीत सुने जा रही थी।
“मेरे रश्के क़मर तूने पहली नज़र
जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया।”
कई बार कारण और परिणाम में
कोई संबंध दिखाई नहीं देता।
लड़की रो रो कर थक चुकी थी
लड़का भी गाड़ी का टायर बदल चुका था।
रात को ढलने
और सुबह को आने का
बेसब्र इंतज़ार था।
कुछ रिश्ते कभी ख़त्म नहीं होते
बस आयाम और माध्यम बदला करते हैं,
चिरंतन चलने के लिए !!
है ना ....

तुम्हारा
देव