Thursday, 24 December 2015

वक़्त कभी नहीं मरता देव




प्रिय देव,
तुमने कहा था न एकबार
कि कभी-कभी
कुछ घटनाएँ पहली बार घट कर भी, जानी-पहिचानी सी लगती हैं।
कोई बात,
कोई मुलाक़ात,
या किसी अनजानी जगह के प्रति
एक अजीब सा आकर्षण।

मैं समझ नहीं पाती
कि जब तुम खुद काल से परे जाकर
जीवन को देख आते हो
तो फिर ये क्यों कहते हो?
कि साल आख़िरी साँसें ले रहा है !

कुछ प्रश्नों के उत्तर
जब यथार्थ से न मिलें
तो अलौकिक को पुकारना,
....निरीह बनकर !
जैसे माँ चली आती है न
बच्चे के दारुण आह्वान पर
वैसे ही वो अलौकिक आ जाएगा
ख़ुद चलकर तुम तक।

वेदना की चक्की में,
कण-कण क्यों पिसते रहते हो देव !
बोलो...
याद है वो बूढ़ा,
जिसकी आवाज़ सुन
तुम खिल उठे थे
और बोले थे
कितनी जवान है, इनकी आवाज़।
क्या वो सिर्फ आवाज़ थी?
या लावण्य भी था दिप-दिप दमकती आत्मा का !

विज्ञान कहता है ना
कि ऊर्जा नहीं मरती
बस रूप बदला करती है।
फिर तुम क्यों दफनाने लगे?
पूरे एक साल को !

सर्द दिनों की गुनगुनी दुपहरी में
किसी सब्ज़ीवाले की आवाज़ सुनी है?
सुनी तो होगी;
मगर ध्यान नहीं दिया।
दूर से पास आकर,
फिर दूर जाती आवाज़।
वक़्त भी ऐसा ही होता है पगलू
कहीं से चलकर हमतक आता है
फिर धीरे-धीरे
हमसे दूर हो जाता है।
और हम इस भरम में जीते हैं
कि वक़्त खत्म हो गया।
वक़्त कभी नहीं मरता देव
वक़्त और आत्मा सहोदर हैं।
बस कुछ बातें हैं,
जो हम नहीं समझ पाते
देह से परे बातें
....देहातीत बातें।

अच्छा सुनो,
इस क्रिसमस पर तुम
उस पुराने चर्च जाओगे न !
चर्च...
जिसके साथ तुम्हारी, कोई पिछली याद जुड़ी है।
ज़रूर जाना
तुम्हें सुकून मिलेगा।
और हाँ,
खुले बालों वाली कोई लड़की
यदि कैन्डल जलाती दिख जाये
तो उसका ध्यान रखना
खुली हुई ज़ुल्फों का
आग की लपट से
एक अजीब सा सम्मोहन है।

पता है...
इस बार मैं सांता की टोपी पहनकर,
कहाँ जा रही हूँ ?
दो बूढ़ों और चार बच्चों से मिलने
ढेर सारी चॉकलेट्स
और मुट्ठीभर दवाइयाँ लेकर।
जीवन अपनेआप में
बहुत बड़ा विरोधाभास है देव
समझ में आकर भी,
समझ से परे।
लेकिन तब भी
जीवन एक उत्सव है।
अगर जो तुम इसको,
पूर्णता में जी लो।
Merry Christmas My Love

तुम्हारी
मैं !






Thursday, 17 December 2015

हर ओढ़ी हुयी हँसी एक नया शून्य छोड़ जाती है




पिछले दो घंटों से
ख़त लिखने की कोशिश में
कई कागज़ बेकार कर दिये।
लेकिन तब भी
चार पंक्तियाँ हाथ न लग सकीं।

सर्दी ने अब मेरे शहर पर भी कब्ज़ा जमा लिया।
मौसम की पहली सर्द रात
मोज़े चढ़ाये ऊनी टोपी लगाकर बैठा हूँ।
वही बादामी-केसरिया कॉलर वाला स्वेटर
और काले रंग का स्पोर्ट्स-लोअर पहने।

ज़िंदगी ने फिर से रफ़्तार पकड़ ली है।
लोग मिलने आते हैं
चेहरों पे चेहरा धरे सब खिलखिलाते हैं
हर ओढ़ी हुयी हँसी एक नया शून्य छोड़ जाती है।
फिर दिल बहलाने के लिए 
मैं  ‘WhatsApp’ खोल लेता हूँ।
किसी को मैसेज नहीं करता
बस सबके ‘WhatsApp Status’ पढ़ा करता हूँ
कुछ लोग अपने ‘status’ हर दूसरे दिन बदल लेते हैं।

पता नहीं क्यों,
अब मैं चेहरे और शब्द नहीं पढ़ पाता !
लगता है,
जैसे शब्द भी गिरगिट बन गए हैं।
इस जल को ही लो
ये पानी है या आग ....
समझ नहीं पाता। 

सोच रहा हूँ
आज देर तक जागूँगा
शायद ख़ुद से मुलाक़ात हो जाये।
बहुत दिन बीते
ख़ुद से दूर हुये !

साल भी जैसे
आखिरी सांस ले रहा है
जल्द ही दो-तीन हिचकियाँ लेकर दफ़न हो जायेगा।

कुछ अजीब सा हो रहा है मेरे साथ इन दिनों,
पत्थर और पागल दोनों आकर्षित कर रहे हैं।
समझदार लोग पत्थरों जैसे लगते हैं
और पागल लोग स्पंदित इंसानों जैसे।
कभी-कभी दुविधा में पड़ जाता हूँ
कि मैं कौन हूँ ?
पत्थर या स्पंदित इंसान !
फिर सोचता हूँ
कि इंसान बनने की कोशिश में
पागल करार न दे दिया जाऊँ।
इसलिए पत्थर मानकर ही
ख़ुद को समझा लेता हूँ।

शादी-ब्याह में जाना बहुत हो रहा है इन दिनों
लिफ़ाफ़ा थमा कर निकलना चाहो, तो भी बच नहीं सकते।
लोग खाने पर ज़ोर देते हैं।
नहीं खाया जाता मुझसे,
स्टॉल-स्टॉल  घूमकर वही एक जैसा खाना।
तुम्हारे हाथों की गरम ख़ुश्क रोटियाँ याद आती हैं।

सबकुछ कितना बदल गया !
नहीं
, नहीं, शायद मैं ही बदल गया।
मगर देखो
शाहरुख और काजोल तो वैसे ही हैं
इतने सालों से
DDLJ से लेकर दिलवाले तक।

सुनो....
मैं स्पंदित होना चाहता हूँ
लोग कुछ भी कहें
मगर ये पथरीली अनुभूति
हर दिन मुझे जकड़ती जा रही है।
कभी-कभी लगता है
कि तुम तो मुझे पागल न समझ बैठोगी ना ?
प्लीज़,
तुम मुझे वही समझना
... जो मैं हूँ।
एक प्रेमी,
जिसने तुमसे प्रेम किया।

चाहता हूँ
कि मिट्टी का कुल्हड़ बन जाऊँ
और तुम्हें प्रेम-रस बनाकर ख़ुद में उड़ेल लूँ।
फिर इधर-उधर भटकूँ
कभी छलक  जाऊँ
तो कभी मुझ जैसे दीवानों की प्यास बुझाऊँ
और जब...
मैं पूरा खाली हो जाऊँ
तो फिसल कर गिर पड़ूँ
टुकड़े-टुकड़े हो जाने के लिए।
हाँ,
मैं स्पंदित होना चाहता हूँ।

तुम्हारा

देव 



Thursday, 10 December 2015

कुछ अफ़सोस इतने निजी होते हैं...





हाँ,
लड़कपन की उम्र थी,
आमने-सामने बैठे थे दोनों।
बीच में लंबी सी मेज़..... खुरदरे हरे सनमाइका वाली।
लड़की ने अपना चेहरा झुका लिया था
नहीं चाहती थी
कि लड़का उसे पढ़े।
और लड़का...
से तो ये भी नहीं पता था
कि वो ख़ुद से क्या चाहता है।

गर्मी की दोपहर में,
एक सन्नाटा तारी था
दूर कोई पक्षी चीख रहा था रह-रह कर
चीं चीं चीं चीं !!!
दोनों की बोल-चाल बंद थी,
यही कोई डेढ़ महीनों से।
पिछले डेढ़ महीने....
जो बहुत भारी थे !!!
जिनका बोझ ढोते-ढोते
दोनों निस्तेज हो चले थे।

विदा की बेला भी पास ही थी।
इतनी पास.....
कि उँगली के दो पोरों पर दिन गिन लो।
स्थायी विदाई
उफ़्फ़ !!!!

लड़का उसे बहुत चाहता था,
मगर हेकड़ीबाज़ था।
और लड़की....
वो बस रो रही थी ज़ार-ज़ार।
पिछले चार हफ़्तों से चुप थी।
बिछड़ने से दो दिन पहले रुलाई फट पड़ी।
आँखों से आँसू की धार यूँ रलक रही थी।
ज्यूँ रातभर की बारिश के बाद,
छत से पानी का रेला बहता है।
एक अनवरत रेला,
दीवार के सहारे-सहारे।

लड़के के जी में आया
कि उसके आँसू पोंछ दे।
मगर हिम्मत न जुटा सका......उसके गालों को छूने की !
वो पागल भी पिछली पूरी रात,
चादर को मुँह में दबाये
रोता रहा था भूखा-प्यासा !
फिर बस....
वे जुदा हो गए।

किसीसे सुना था लड़के ने
कि उसकी शादी हो गई।
पिछले बीस सालों में,
तीन बार वो लड़की उसके सपनों में आयी।
कभी उदास सी,
तो कभी प्रश्न भरी आँखें लिये।
हर सपने के बाद,
पूरे-पूरे हफ़्ते लड़के को नींद नहीं आयी।

कुछ अफ़सोस इतने निजी होते हैं...
कि चाहकर भी हम,
उनका ज़िक्र किसीसे नहीं कर पाते।
पता नहीं कैसे....
ये गलती हो जाती है।
नीबू को खड़ा काट कर
हम अफ़सोस मनाते रहते हैं।

तुम अक्सर नाराज़ होती हो ना
कि मैं हर बात का ढिंढोरा पीट दिया करता हूँ;
कि मैं किसी भी बात को व्यक्तिगत नहीं रहने देता;
कि मैं तुम्हारे प्रति मेरे प्यार का इज़हार…..
इतना खुलकर क्यों करता हूँ !!

हीर मेरी....
मैं वो गलती नहीं दोहराना चाहता
जो उस लड़के ने की थी।
कोई मुझ पर हँस ले, गिला नहीं।
पर मैं अपने दिल की बात ना कह पाऊँ,
ये मुझे मंज़ूर नहीं।

ओह गालिब
कैसी-कैसी बातें करते थे तुम भी।
“ या रब !
वो न समझे हैं, ना समझेंगे मेरी बात
दे और दिल उनको, जो न दे मुझको ज़बां और।”
कोई ख़ुद होकर,
अपने प्यार का तमाशा नहीं बनाता।
मुनिया मेरी,
बच्ची हो तुम....
मासूम सी।
मेरी एलिस इन वंडर-लैंड,
....... जीयो !!!

तुम्हारा


देव 







Thursday, 3 December 2015

पता है, मेरा सेफ़्टी-वॉल्व हो तुम



स्वीकारता हूँ
कि मैं नॉस्टैल्जिक हूँ
शायद तब से....
जब जानता भी नहीं था
कि नॉस्टैल्जिया का मतलब क्या है !

रातों को जब
बोझिल पलकों के साथ भी
सो नहीं पाता
तब एक विचार
बरबस चला आता है।
कि बचपन में किस चीज़ का नॉस्टैल्जिया था मुझे ?
क्या पिछले जनम का !!

पता है
मेरा सेफ़्टी-वॉल्व हो तुम।
अगर तुम नहीं मिलतीं
तो फट चुका होता
....जाने कब का !!!

वक़्त....
जैसे सर्कस के एरिना में झूलती हुयी रस्सियाँ,
और उम्र....
जैसे उस पर कलाबाज़ी करते कलाकार !
नीचे कोई सुरक्षा जाल भी नहीं।
कमाल तो देखो
पता ही नहीं चलता
एक रस्सी पर झूलते-झूलते
जाने कब दूसरी रस्सी हाथ में आ जाती है।
और वो पहले वाली रस्सी अदृश्य हो जाती है।
हम फिर नयी रस्सी को अंगीकार कर
झूलने लगते हैं
इधर से उधर !!

सुनो....
फिर-फिर क्यों लौटा लाती हो मुझे तुम ?
मेरे पिछले दिनों में !
कभी-कभी लगता है,
कि तुम किसी टाइम-मशीन पर सवार रहती हो।
जाने कब, कहाँ और कैसे
चूल्हे पर रोटियाँ बनाने पहुँच गईं।
और तुम्हारी उस एक तस्वीर ने
मुझे जाने कितने बरस पीछे पहुँचा दिया।

ये मिट्टी का चूल्हा
ये चकला-बेलन
देसी तवा, पीतल के बर्तन
..... उफ्फ़ !!!
देगची में तरकारी
परात में लगा हुआ आटा।
माँ याद आ गईं !
सर्दी के दिनों में
पूरी बाँह का ब्लाउज़ पहने
गरम-गरम रोटियाँ सेक कर खिलाती माँ।
चूल्हे की गरम राख़ में
मीठे शकरकंद दबाकर
भोजन के बाद मीठा खिलाती माँ !!!

प्यारी .....
जब तुम मुझे इश्क़ कह कर बुलाती हो ना
तो मेरी सारी बेचैनियां तिरोहित हो जाती हैं। 
तुम जब मेरा खयाल रखती हो न
तब मैं देव नहीं रहता
एक नन्हा सा छौना बन जाता हूँ
अबोध बच्चा
ममता की छांह तलाशता हुआ !!!

एक गुज़ारिश है तुमसे
वादा करो
कि आज के बाद
कभी मुझसे ये न कहोगी
कि मैं तुम्हें दुनिया की नज़रों से बचाकर रखूँ
कि मैं तुम्हारा नाम, तुम्हारा चेहरा सबसे छिपाकर रखूँ
मुझसे ये न कहोगी
कि,
“देव,
साँस भी तो साथ रहती है
पर किसी को दिखती नहीं।”

चाहता हूँ,
बस एक बार....
चूल्हे पर रोटी बना कर
तुम मुझे अपने हाथों से खिलाओ।  
और उस एक पल को...
मैं अपने भीतर
कुछ यूं सहेज लूँ,
कि कोई मुझसे जब
तुम्हारी बात करे
तो मेरी आँखों में उसे
तुम दिख जाओ,
तुम्हारा अक्स दिख जाये
तुम्हारा नाम दिख जाये !
कह दो कि ऐसा होगा...

बहुत जल्द !!
हाँ कह दो ना .....

तुम्हारा

देव